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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

मौलाना अब्दुल कलाम भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री: कुछ तथ्य, इतिहास के पन्नो से।

क्या आप जानते हैं कि सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी आखिर कौन था.?
कृपया ध्यान से पढ़िये, पूरा पढ़िये।
सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी कांग्रेस का बहुत बड़ा नेता था। कांग्रेस ने उसे हिन्दू मुस्लिम एकता का पोस्टर बॉय और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा ठेकेदार बना दिया था। 1947 में आजादी मिलने के तत्काल बाद सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से भिड़ गया था। उस समय दिल्ली में हो रहे भयानक दंगे के दंगाइयों से सख्ती से निपट रहे दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर जो कि एक सिक्ख थे, को उनके पद से हटा कर उन्हें दण्डित करने की मांग सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी ने देश के गृहमंत्री सरदार पटेल से की थी। सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी ने सरदार पटेल से कहा था कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से मुसलमान नाराज हैं और उसके खिलाफ आरोप लगा रहे हैं इसलिए उस पुलिस कमिश्नर को तत्काल हटा कर दण्डित किया जाए। लेकिन सरदार पटेल ने उसकी उस बेहूदी मांग को मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि दिल्ली के दंगों को नियंत्रित करने के सफल प्रयासों के कारण उस सिक्ख पुलिस कमिश्नर की प्रशंसा पूरे देश में हो रही थी। इसके कुछ दिनों बाद सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी देश के गृहमंत्री सरदार पटेल के पास अपनी एक और मांग लेकर पहुंच गया था। उसने मांग की थी कि विभाजन के कारण पाकिस्तान चले गए मुसलमानों की जमीनों और घरों को हिन्दूस्तान में रह गए मुसलमानों को ही दे दिया जाए। 
सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी की उस मांग का सीधा सा अर्थ यही था कि पाकिस्तान भाग गए गद्दारों की जमीन मकान भी सरकार कब्जा नहीं करे और मुसलमानों को ही दे दे। उसकी इस बेतुकी बेहूदी मांग पर सरदार पटेल ने उसे जमकर डपटा था। अब आप यह भी जानिए कि सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी आखिर था कौन.?
उपरोक्त सवाल का जवाब यह है कि सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी नाम का नौजवान सऊदी अरब में जन्मा था और भारत में 1919 में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक था। सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी की शिक्षा दीक्षा मदरसे में ही हुई थी। ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल आदि औपचारिक शिक्षा देने वाले किसी स्कूल में वो नहीं पढ़ा था। लेकिन जब देश स्वतन्त्र हुआ उस समय देश में कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और डॉक्टर राधाकृष्णन सरीखे महान विद्वानों के होते हुए भी जवाहरलाल नेहरू ने देश के पहले शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी को ही बैठा दिया था। 1958 में हुई उसकी मौत तक सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी देश की शिक्षा व्यवस्था का कर्ताधर्ता बना रहा। जरा कल्पना करिए कि जिस व्यक्ति ने ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल आदि की औपचारिक शिक्षा देने वाले किसी स्कूल तक का मुंह नहीं देखा था उसे कांग्रेस ने देश की शिक्षा नीति की कमान सौंप दी थी।

सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी जिस खिलाफत आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक रहा था। उस आंदोलन का एकमात्र मूल उद्देश्य तत्कालीन तुर्की में इस्लाम के खलीफा सुल्तान की गद्दी और उसके कट्टर इस्लामिक साम्राज्य को बचाना था। हास्यास्पद और शर्मनाक तथ्य यह है कि खुद तुर्की में ही उस इस्लाम के खलीफा सुल्तान की कट्टरपंथी रूढ़िवादी मजहबी सोच के खिलाफ भयंकर जनाक्रोश की आग भड़की हुई थी। परिणाम स्वरूप 1923 में इस्लाम के उस खलीफा और उसकी कट्टरपंथी रूढ़िवादी मजहबी नीतियों वाले शासन का हमेशा के लिए अंत हो गया था। कमाल अतातुर्क पाशा ने तुर्की की सत्ता सम्भाल ली थी।
लेकिन 1919 से 1923 तक सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी भारत के मुसलमानों को संगठित कर के तुर्की के उस इस्लामी खलीफा के इस्लामिक राज्य को बचाने के लिए हंगामा हुड़दंग कर रहा था।

सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी, नाम उसकी असलियत को उजागर कर देता इसलिए वामी हरामी इतिहासकारों ने उसे मौलाना अबुल कलाम आजाद ही लिखा। उसे महान शिक्षाविद, हिन्दू मुस्लिम एकता का पोस्टर बॉय और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा ठेकेदार शिक्षाविद बना डाला।
लेकिन अब आप स्वयं ही यह तय करें कि सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी, आखिर क्या था, कौन था.? वो महान शिक्षाविद था या मदरसा छाप था.? वो सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा ठेकेदार था या घोर कट्टर साम्प्रदायिक तुर्की के खलीफा का भारतीय गुर्गा था।

आढ़तियों -शाहीनबाग आंदोलन पर सदगुरु

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

गाँधी खानदान शरद पवार 22/02/1994 को खायी कसम भी काभि काभि जनता को बता दिया करो।

आआपको कोंग्रेस का कोई पप्पु या शरद पवार जैसा राजनेता 22 फरवरी 1994 में किया गया संकल्प काभि नही बताएगा, क्यो?

               22 फर. 1994 को भारतीय संसद में कश्मीर सम्बन्ध में एक संकल्प प्रस्तावित किया गया था जो कि सर्वसम्मति से पारित भी किया गया था. इस प्रस्ताव में कहा गया था कि कश्मीर के जो क्षेत्र चीन द्वारा 1962 में और पाकिस्तान द्वारा 1947 में कब्जा लिए गए थे उन क्षेत्रों को हम वापिस लेकर रहेंगे और इस बारे में किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे. इस संकल्प में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान को यह चेतावनी दी कि वह अवैध रूप से अतिक्रमण किये गए इस क्षेत्र को तुरंत खाली कर दे. वर्ष 1994 में लिए गए इस संकल्प का उद्देश्य जम्मू कश्मीर के साथ पूरे विश्व को यह सन्देश देना था कि प्रत्येक स्थिति में भारतीय सरकार जम्मू कश्मीर के साथ है. 22 फरवरी 1994 को पी वी नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व काल में संसद नें जिस संकल्प को पारित किया था बाद के वर्षों में अन्य प्रधानमंत्रियों के काल में यह प्रस्ताव धूल तले दबता जा रहा है. बाद की सरकारों ने इस प्रस्ताव के सन्दर्भ में प्रतिवर्ष इसका स्मरण तक करनें का प्रयास नहीं किया. नरसिम्हाराव के बाद की कांग्रेस की सरकारों की अब्दुल्ला परिवार के साथ जिस प्रकार की संदेहास्पद और रहस्यमयी आपसी समझ बूझ है उसके कारण से इस कथित प्रस्ताव पर चर्चा-स्मरण न होना स्वाभाविक लगता है. कांग्रेस की सतत चली आ रही कश्मीर पर तदर्थवाद की नीति में तो यह ठीक लगता है किन्तु अन्य अटलजी की सरकार के समय भी इस प्रस्ताव पर गंभीर राजनयिक कदम नहीं बढ़ा पाई थी. आज आवश्यकता है कि देश इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव के सन्दर्भ में जानें और भारतीय संसद और सम्पूर्ण भारतीय राजनीति भी अपनें द्वारा पारित इस प्रस्ताव की आत्मा को समझकर इस अनुरूप आचरण करें. इस प्रस्ताव में निम्नानुसार तथ्य कहे गए थे –

यह सदन पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकियों के शिविरों पर गंभीर चिंता जताता है.  इसका मानना है कि पाकिस्तान की तरफ से आतंकियों को हथियारों और धन की आपूर्ति के साथ-साथ भारत में घुसपैठ करने में मदद दी जा रही है. सदन भारत की जनता की ओर से घोषणा करता है-
(1) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारतीय गणराज्य का अभिन्न अंग है और रहेगा. भारत अपने इस भाग को पुनः भारत में विलय का हरसंभव प्रयास करेगा.
(2) भारत में इस बात की पर्याप्त क्षमता और संकल्प है कि वह उन अलगाववादी और आतंकवादी शक्तियों का मुंहतोड़ जवाब दे, जो देश की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रिय अखंडता के खिलाफ हों और मांग करता है कि –
(3) पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन क्षेत्रों को खाली करे, जिन्हें उसने कब्जाया और अतिक्रमण किया हुआ है.
(4) भारत के आंतरिक मामलों में किसी भी हस्तक्षेप का कठोर जवाब दिया जाएगा.
जम्मू कश्मीर से हमारा तात्पर्य केवल जम्मू, कश्मीर या लदाख तक सीमित नहीं है. जम्मू कश्मीर में इन तीनो क्षेत्रो के साथ वह क्षेत्र भी आता है जिस पर पाकिस्तान से अवैध रूप से कब्ज़ा किया हुआ है. यह क्षेत्र है मीरपुर मुजफराबाद और गिलगित बल्तिस्तान. गिलगित बल्तिस्तान इन दो क्षेत्रों के विषय में हमें जान लेना चाहिए कि विश्वविख्यात प्राचीन सिल्क रूट इस गिलगित बल्तिस्तान में ही पड़ता है. इसी सिल्क रूट के माध्यम से भारत शेष एशिया एवं यूरोप में व्यापार किया करता था. वर्तमान में यह क्षेत्र गिलगित बल्तिस्तान पाकिस्तान के अतिक्रमण किये हुए कब्जे में है और यहां के निवासी अब तक भी भी पाकिस्तानी शासन को नहीं मानते हैं. पिछले दशकों में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की नागरिक सुविधाओं का विस्तार नहीं हुआ. यहां के नागरिक पाकिस्तानी सेना के द्वारा निरंतर नारकीय यातनाएं भोग रहें हैं और मनावाधिकारों की धज्जियां उड़ रही है. हत्याएं, अपहरण संपत्ति पर कब्जा इन क्षेत्रों में ठीक इसी प्रकार हो जाता है जैसे किसी कबीले में होता है.

              भारत की कश्मीर नीति में शिमला समझौते को पाकिस्तान और विश्व समुदाय एक मील पत्थर के रूप में लेता है और यही वह कोण है जहां आकर भारत फंस जाता है. राजनयिक दृष्टि से अति कुशाग्रता और हावी होते हुए यदि शिमला समझौते को व्यक्त किया जाए तब तो इस समझौते से भारत को लाभ मिल सकता है अन्यथा जिस प्रकार इस समझौते की ढूलमूल व्याख्या होती रही है उससे तो यह कश्मीर मुद्दा कण मात्र भी आगे नहीं बढ़ने वाला है. आवश्यकता है कश्मीर पर संकल्पशील और आक्रामक भारतीय नेतृत्व की और प्रतिबद्ध केंद्र सरकार की. भारत-पाकिस्तान ने 1972 में हुए शिमला समझौते में एलओसी को दोनों देशों के बीच सीमा के रूप में स्वीकार करनें की एतिहासिक भूल कर ली थी. इस समझौते में जब हमारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भट्टो ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर करके एलओसी को दोनों देशों की सीमा के रूप में स्वीकार कर लिया था. पाकिस्तान पक्ष के कश्मीर विशेषज्ञ प्रश्न करते हैं कि अब हम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का भारत में विलय किस तरह से कर सकते हैं? पाकिस्तानी कश्मीरी विशेषज्ञ भारत-पाक के बीच कश्मीर के मुद्दे के सुलझ जानें का दावा करते हैं और भौगोलिक नक्शों के अपरिवर्तनीय होनें का दम भरते हैं.  भारतीय पक्ष से यहां यह स्मरणीय भी है और महत्वपूर्ण भी कि जिसे हम पीओके कहतें हैं एवं पाकिस्तान जिसे  आजाद कश्मीर कहता है, वह क्षेत्र जम्मू का हिस्सा था न कि कश्मीर का; अतः उसे कश्मीर कहा ही नहीं जा सकता. न तो वह कश्मीर का अंश था और न ही इस रूप में उसका समझौता हो सकता था. वहां की लोक भाषा भी कश्मीरी न होकर डोगरी और मीरपुरी का मिश्रण है. इतिहास को यदि हम क्रमवार देखें और इन तकनीकी भूलों को आलोकित करें तो शिमला समझौते की भी समीक्षा के उजले अवसर आभास होतें हैं. और यदि हम महाराजा हरिसिंग के विलय प्रस्ताव को और उसकी भारतीय गणराज्य की ओर से की गई स्वीकृति के दस्तावेज को देखें तो इनकें शब्दों में कही कोई विरोधाभास नहीं है. विलय के दस्तावेज कश्मीर के पूर्ण विलय के तथ्य को सुस्पष्ट घोषणा की स्थिति में दिखते  हैं. अब इन सब परिस्थितियों में से कौन सा भारतीय प्रधानमन्त्री और कौन सी सरकार राह बनाकर आगे बढ़ पाती है यही एक प्रश्न भी है और प्रतीक्षा भी !!

            दुखद यह तथ्य भी है कि भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर परिस्थितियां जो सहज कभी नहीं रही उनकी असहजता जस की तस नहीं है. परिस्थितियां निरंतर उलझ रही हैं और भारतीय पक्ष को कमजोर कर रही हैं. भारत कश्मीर में उस स्थिति में खड़ा है जहाँ उसके पास खोनें को बहुत कुछ है और तथ्य यह है कि हम निरंतर कश्मीर में कुछ न कुछ खो रहे हैं. पिछले दशकों की घटनाओं की समीक्षा करें तो यह दुखद तथ्य ही और पछतावा ही हमारें हाथ लग रहा है कोई उपलब्धि नहीं. पाक कब्जे वाले कश्मीर में चीन की नई उपस्थिति इस कड़ी में एक बड़ी और कठिन गाँठ के रूप में हम भारतीयों के समक्ष है. पाक और चीन के बीच पीओके में निर्माण कार्यों को लेकर आठ समझौते हो चुकें हैं जिन्हें न रोक पाना भारतीय राजनयिक विफलता की एक बड़ी कहानी है. चीन और पाकिस्तान पीओके से होते हुए एक 200 किमी लम्बी सुरंग का निर्माण कर रही है जिस पर 18 अरब डालर का भारी भरकम खर्च होना है. अब इस महत्वपूर्ण गलियारे में इस सुरंग के माध्यम से चीन की उपस्थिति भारत के लिए एक नई समस्या के रूप में है. इस सुरंग से चीन के कई दीर्घकालिक सैन्य,आर्थिक, और सामरिक लक्ष्य सिद्ध होंगे और इन सभी मोर्चों पर उसके हित भारतीय हितों की कीमत पर फलित होंगे यह भी सत्य है. चीन पहले से ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से इस क्षेत्र में हावी था, अब यह सुरंग अरब सागर में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन में काशगर से जोड़ेगी. इस सुरंग से चीन पश्चिम एशिया और स्टेट आफ हरमुज तक सहजता और सरलता से पहुंचेगा. यही वह मार्ग है जहाँ से जहां से दुनिया के एक तिहाई तेल उत्पादन का परिवहन होता है. केवल यही नहीं अपितु और भी दसियों चिंताएं हैं जो पिछले वर्षों में भारत-पाक के बीच पीओके को लेकर बढ़ गई हैं. अब इन चिंताओं का निवारण कैसे हो और नई चिंताओं का जन्म लेना किस प्रकार रुके यह एक यक्षप्रश्न है वर्तमान केंद्र सरकार के सामनें.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

जामुन की लकड़ी का महत्व

#जामुन_की_लकड़ी_का_महत्त्व
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अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती और पानी सड़ता नहीं । टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता ।

जामुन की एक खासियत है कि इसकी लकड़ी पानी में काफी समय तक सड़ता नही है।जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।नाव का निचला सतह जो हमेशा पानी में रहता है वह जामून की लकड़ी होती है।

गांव देहात में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है। आजकल लोग जामुन का उपयोग घर बनाने में भी करने लगे है।
जामून के छाल का उपयोग श्वसन गलादर्द रक्तशुद्धि और अल्सर में किया जाता है।

दिल्ली के महरौली स्थित निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है । 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ पानी के सोते बंद नहीं हुए हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।

इस बावड़ी में भी जामुन की लकड़ी इस्तेमाल की गई थी जो 700 साल बाद भी नहीं गली है। बावड़ी की सफाई करते समय बारीक से बारीक बातों का भी खयाल रखा गया। यहाँ तक कि सफाई के लिए पानी निकालते समय इस बात का खास खयाल रखा गया कि इसकी एक भी मछली न मरे। इस बावड़ी में 10 किलो से अधिक वजनी मछलियाँ भी मौजूद हैं।

इन सोतों का पानी अब भी काफी मीठा और शुद्ध है। इतना कि इसके संरक्षण के कार्य से जुड़े रतीश नंदा का कहना है कि इन सोतों का पानी आज भी इतना शुद्ध है कि इसे आप सीधे पी सकते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि पेट के कई रोगों में यह पानी फायदा करता है।

पर्वतीय क्षेत्र में आटा पीसने की पनचक्की का उपयोग अत्यन्त प्राचीन है। पानी से चलने के कारण इसे "घट' या "घराट' कहते हैं।घराट की गूलों से सिंचाई का कार्य भी होता है। यह एक प्रदूषण से रहित परम्परागत प्रौद्यौगिकी है। इसे जल संसाधन का एक प्राचीन एवं समुन्नत उपयोग कहा जा सकता है। आजकल बिजली या डीजल से चलने वाली चक्कियों के कारण कई घराट बंद हो गए हैं और कुछ बंद होने के कगार पर हैं।

पनचक्कियाँ प्राय: हमेशा बहते रहने वाली नदियों के तट पर बनाई जाती हैं। गूल द्वारा नदी से पानी लेकर उसे लकड़ी के पनाले में प्रवाहित किया जाता है जिससे पानी में तेज प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। इस प्रवाह के नीचे पंखेदार चक्र (फितौड़ा) रखकर उसके ऊपर चक्की के दो पाट रखे जाते हैं। निचला चक्का भारी एवं स्थिर होता है। पंखे के चक्र का बीच का ऊपर उठा नुकीला भाग (बी) ऊपरी चक्के के खांचे में निहित लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाया जाता है। पानी के वेग से ज्यों ही पंखेदार चक्र घूमने लगता है, चक्की का ऊपरी चक्का घूमने लगता है।पनाले में प्रायः जामुन की लकड़ी का भी इस्तेमाल होता है |फितौडा भी जामुन की लकड़ी से बनाया जाता है ।

जामुन की लकड़ी एक अच्छी दातुन है।

जलसुंघा ( ऐसे विशिष्ट प्रतिभा संपन्न व्यक्ति जो भूमिगत जल के स्त्रोत का पता लगाते है ) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते । 

मुस्लिम और पारसी में क्या फर्क है?

हम भारतीयों को आप पारसियों पर बहुत गर्व है 

कोविड  वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम पारसी की है जिसका नाम है आदार पूनावाला 

आदार पूनावाला ने बॉम्बे पारसी पंचायत 60000 वैक्सीन ऑफर किया था कि पारसी लोगों को पहले वैक्सीन  लग जाए लेकिन बॉम्बे पारसी पंचायत के अध्यक्ष और उसके अलावा प्रख्यात उद्योगपति रतन टाटा ने यह कहा कि हम पहले भारतीय हैं बाद में पारसी हैं हमें वैक्सीन तभी चाहिए जब सभी भारतीयों को वैक्सीन मिलेगी

फैक्ट्री  से शुरू हो रही वैक्सीन   आगे कैसे बढ़ती है वह देखिए

 वैक्सीन जिस कांच की शीशी में यानी व्हाईल में पैक होती है उसे भी एक पारसी की कंपनी बनाती है इसका नाम स्कॉट्सलाइस है जिसके मालिक रीशाद दादाचन्दजी  हैं

वैक्सीन को पूरे भारत में ट्रांसपोर्टेशन के लिए रतन टाटा ने अपनी कंपनी की रेफ्रिजरेटेड वाहन मुफ्त में दिया है

यदि वैक्सीन को हवाई मार्ग द्वारा जेट से भेजना होता है तो उसके लिए एक दूसरे पारसी श्री जाल वाडिया ने अपने 5 जेट को दिया है

वैक्सीन को रखने के लिए जिस ड्राई आइस यानि लिक्विड कार्बन डाइऑक्साइड का प्रयोग किया जा रहा है उसे भी एक पारसी फ़रोक दादाभोई दे रहे है

भारत में 25 जगहों पर वैक्सीनेशन के स्टोर के लिए एक दूसरे पारसी आदि गोदरेज ने अपने रेफ्रिजरेटेड यूनिट को सौंप दिया है

सोचिए इन पारसियों  को भारत की कोई सुविधा नहीं चाहिए यह खुद को कभी अल्पसंख्यक मानते ही नहीं और आज तक एक भी पारसी  अल्पसंख्यक कल्याण योजना का फायदा नहीं लेता बल्कि पारसी  खुद को अल्पसंख्यक नही बल्कि  भारतीय समझते हैं भारत के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं भारत की जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान दे रहे हैं भारत को सबसे ज्यादा टैक्स दे रहे हैं और जब भी भारत की मदद करनी होती है तो सबसे आगे पारसी आते हैं 

जबकि भारत में एक और कौम (मुस्लिम) भी हैं जिनका टैक्स में योगदान नगण्य के बराबर है। लेकिन उसे भारत की हर सुविधाएं मुफ्त में चाहिए हर सरकारी अस्पताल में उसे मुफ्त में इलाज चाहिए हर सरकारी योजना का उसे फायदा चाहिए।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

रोना नही।संतोष आनंद मशहूर गीतकार का जीवन।

नाम, पैसा, शोहरत, इबरत ... लेकिन किस्मत का पहिया ऐसा चला कि न पैसे बचे और न इब्राहत ... सबसे खास बात यह है कि बेटा नहीं बचा और न बहू ! .. बहुत अकेला जीवन उनके नसीब में आया। उन का पोता भगवान की एक छोटी सी कृपा के रूप में उसके साथ है! संतोष आनंद एक दुर्भाग्यशाली कलाकार हैं! इक प्यार का नगमा है ... मेघा रे मेघा रे ... मुझे क्या कमी है तुम्हारे पास ... प्रेम क्या है ... इतने सारे सार्थक और सुपरहिट गाने लिखना जैसे ... उस समय के प्रसिद्ध ... दो फिल्मफेयर और प्रतिष्ठित यश भारती पुरस्कार जीतना ... एक गीतकार जो कभी प्रसिद्ध और करीबी दोस्तों के घेरे में रहते थे ..! सब कुछ ठीक था .. केवल एक बेटा, बहू और एक प्यारी पोती .. लेकिन लड़का किसी तरह की धोखाधड़ी में फंस गया ... और उसने एक दिन उसने निर्णय लिया और अपनी पत्नी और केवल 4 वर्षीय बेटी के साथ, मैं एक चलती हुई ट्रेन के नीचे चला गया। वह और उसकी पत्नी का निधन हो गया, लेकिन बेटी, जो गंभीर रूप से घायल थी, बच गई। शायद संतोष आनंद की देखभाल के लिये। लड़के ने अपनी मौत से पहले 10 पेज का सुसाइड नोट लिखा .. बड़े पदाधिकारियों पर आरोप लगाया लेकिन उस पर अभी तक कुछ नहीं हुआ है .. अगर ऐसा होता है, तो भी बेटे और बहू को वापस नहीं आएंगे। जो समय बीत चुका है वह फिर नहीं आएगा। तुम्हारे सिवा मेरे दिल में कोई नहीं आएगा,,,, हमने घर जला दिया, अब हमें राख चुननी है,,, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है ... ये गीत उनकी ही देन है। लेकिन दुर्भाग्य का सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है .. गीतकार संतोष जआनंद विकलांग हो गए .. उन्होंने 3-4 बार पैर की सर्जरी कराई। व्हीलचेयर पे आगए अब। अंग बहुत कांपते हैं ... आवाज़ कट जाती है .. भले ही उनके पास रहने के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन लेखन सांस उतनी ही दिखाई देती है ..! कुछ हासिल करना है और कुछ खोना है,,,, जीवन का अर्थ है आना-जाना,,,, दो क्षणों के जीवन से,,,, एक उम्र चोरी करना है,,, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है ... कल इंडियन आइडल पर संतोष आनंद की कहानी सुनकर मैं दर्द हुआ। नेहा कक्कर की सराहना। उन्हें देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगीं .. उनके गले से लिपट गईं और रो पड़ीं .. प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा .. उन्हें भावुक आश्वासन दिया .. मुख्य बात 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद थी! .. स्वाभिमानी संतोष आनंद ने विनम्रता से! उस स्थिति में भी इसका खंडन किया .. 'मैं अभी भी काम कर रहा हूँ .. मैं यहाँ और वहाँ जाता हूँ ..' यह कहते हुए, उनकी आवाज़ भर गई और हमारी आँखें सुन रही थीं! नेहा ने उन्हें समान स्नेह के साथ उपहार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया। नेहा ने पहले भी फुटपाथ पर एक हारमोनियम बजाने वाले को 1 लाख रुपये का दान देने की घोषणा की थी। मैंने उसे रोते हुए नाटकीय नहीं पाया। वह 10 साल पहले इंडियन आइडल से आई है। गरीबी देखी गई है। वह उम्र में युवा है ... लेकिन उदार होने के लिए, किसी को सामाजिक जागरूकता होनी चाहिए, यह उसके अंदर है। किसी की समस्या सुनकर, उसका हाथ तुरंत मदद के लिए आगे आता है .. भले ही पैसा हो, कोई दान नहीं है! यह दूसरा संवेदनशील वाकया है। ईश्वर उसे बहुत खुशहाल जीवन और पूर्ण सफलता दे !! कल की इंडियन आइडल घटना बहुत खूबसूरत थी .. दिल को छू लेने वाली थी ... आइए इसे फिर से देखें! .. संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के एवीट गाने .. टोडी के प्रतियोगी .. सबसे महत्वपूर्ण बात एक असामान्य गीतकार की पहचान है जो ग .. फिर भी हम गाने सुनते हैं लेकिन उनके पीछे गीतकार संगीतकार के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं! संतोष आनंद को दुनिया के सामने लाने के लिए इंडियन आइडल का बहुत-बहुत धन्यवाद! .. उनके शब्दों 'किसी ने उन्हें याद किया ..' ने मुझे दुखी किया! इस शो को देखने वाले हर कोई रोया होगा ... आंखों में सागर है, आशा के आंसू हैं,,,, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है ... भगवान संतोष आनंद को एक स्वस्थ जीवन दे सकते हैं, जो असामान्य शब्दों में समृद्ध है!

स्वतंत्रता संग्राम में दलितों का बलिदान जो आपको काभि बताया नही गया।

एक सोची-समझी साजिश के तहत बहुजनों के इतिहास को या तो नजर अंदाज कर दिया गया या फिर उसे मिटाने की कोशिश की गई. आजादी के आंदोलन में भी यही हुआ. लेखनी पर जिनका एकाधिकार रहा उन्होंने मनचाहे तरीके से इतिहास को दर्ज किया. लेकिन अब इतिहास की परतों में से तमाम बहुजन नायक बाहर आने लगे हैं. देश की आजादी की लड़ाई के दौरान तमाम बहुजन नायक ऐसे रहें जो अंग्रेजों के सामने चट्टान की तरह खड़े रहे. दलित दस्तक ऐसे दर्जन भर नायकों को सामने लेकर आया है।

वैसे तो देश की आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 का माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में शुरू हो गया था. तिलका मांझी युद्ध कला में निपुण और एक अच्छे निशानेबाज थे. इस वीर सपूत ने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर तीर से कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा प्रांत में दलित-आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. इस विद्रोह में अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी. सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता से भी अंग्रेज कांपते थे. बाद में अंग्रेजों ने इन वीर सेनानियों को पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया.

इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल 1804 में बजा. छतारी के नवाब नाहर खां अंग्रेजी शासन के कट्टर विरोधी थे. 1804 और 1807 में उनके बेटों ने अंग्रेजों से घमासान युद्ध किया. इस युद्ध में जिस व्यक्ति ने उनका भरपूर साथ दिया वह उनका परम मित्र उदईया था, जिसने अकेले ही सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा. बाद में उदईया पकड़ा गया और उसे फांसी दे दी गई. उदईया की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों में प्रचलित हैं.

चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले दो प्रमुख नाम चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर के भी थे। उन्होंने आजादी के लिए न केवल फिरंगियों से टक्कर ली बल्कि देश की आन-बान और शान के लिए कुर्बान हो गए. क्रांति का बिगुल बजते ही देश भक्त चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर भी 26 मई 1857 को सोरों (एटा) की क्रांति की ज्वाला में कूद पड़े. वे इस क्रांति की अगली कतार में खड़े रहे. फिरंगियों ने दोनों दलित क्रांतिकारियों को पेड़ में बांधकर गोलियों से उड़ा दिया और बाकी लोगों को कासगंज में फांसी दे दी गई.

बांके चमार
इसी तरह 1857 की जौनपुर क्रांति के दौरान जिन 18 क्रांतिकारियों को बागी घोषित किया गया उनमें सबसे प्रमुख बांके चमार थे। बांके चमार को जिंदा या मुर्दा पकडऩे के लिए ब्रिटिश सरकार ने उस जमाने में 50 हजार का इनाम घोषित किया था. बांके को गिरफ्तार कर मृत्यु दंड दे दिया गया.

वीरा पासी

जलियांवाला बाग के बाद दूसरे सबसे बड़े सामूहिक नरसंहार की गवाह बनी थी रायबरेली की माटी, जहां अंग्रेजों ने सैकड़ों किसानों को घेरकर बर्बरतापूर्वक गोलियों से भून दिया था. उसी रायबरेली की धरती ने स्वाधीनता की लड़ाई में वीरा पासी जैसा नायक दिया. इस नायक ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. इस योद्धा से खौफजदा अंग्रेजी सरकार ने वीरा पासी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया था. वीरा पासी रायबरेली क्षेत्र के राणा बेनी माधव के मुख्य सिपहसालार और अंगरक्षक थे. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.

बुद्धु भगत
गुमनामी में खो गए जिन शहीदों का नाम आता है, उनमें वीर बुद्धु भगत भी थे। छोटा नागपुर के वे ऐसे जननायक थे, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए बल्कि उन्हें उरांव आदिवासी इलाका छोड़ने को मजबूर भी कर दिया। इस युद्ध में उनकी बेटियां रुनिया और झुनिया ने भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में हि्स्सा लिया और शहीद हो गईं।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि प्राणों की आहुति भी दी.

वीरांगना झलकारी बाई
वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक वीरांगना थीं। यह चर्चित बात है कि झलकारी बाई और लक्ष्मीबाई की सकल-सूरत एक दूसरे से काफी मिलती जुलती थी, इसलिए अंग्रेज झलकारीबाई को ही रानी लक्ष्मीबाई समझकर काफी देर तक लड़ते रहे. बाद में झलकारीबाई शहीद हो गईं लेकिन इतिहासकारों ने झलकारीबाई के योगदान को हाशिए पर रखकर रानी लक्ष्मीबाई को ही वीरांगना का ताज दे दिया.

वीरांगना ऊदादेवी
वीरांगना ऊदादेवी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। 16 नवम्बर 1857 को लखनऊ के सिकन्दरबाग चौराहे पर घटित इस अपने ढंग के अकेले बलिदान को इतिहास के पन्नों से दूर ही रखा गया. ऊदादेवी नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दस्ते की कप्तान थीं. इनके पति का नाम मक्का पासी था. जो लखनऊ के गांव उजरियांव के रहने वाले थे. अंग्रेजों ने लखनऊ के चिनहट में हुए संघर्ष में मक्का पासी और उनके तमाम साथियों को मौत के घाट उतार दिया था. पति की मौत का बदला लेने के लिए वीरांगना ऊदादेवी 16 नवंबर 1857 सिकंदर बाग (लखनऊ) में एक पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज फौजियों को गोलियों से भून दिया था और बाद में खुद भी शहीद हो गईं थीं.

महाबीरी देवी वाल्मीकि
दलित समाज की महाबीरी देवी वाल्मीकि को तो आज भी बहुत कम लोग जानते हैं. मुजफ्फरपुर की रहने वाली महाबीरी को अंग्रेजों की नाइंसाफी बिलकुल पसंद नहीं थी. अपने अधिकारों के लिए लडऩे के लिए महाबीरी ने 22 महिलाओं की टोली बनाकर अंग्रेज सैनिकों पर हमला कर दिया. अंग्रेजों को गांव देहात में रहने वाली दलित महिलाओं की इस टोली से ऐसी उम्मीद नहीं थी. अंग्रेज महाबीरी के साहस को देखकर घबरा गए थे. महाबीरी ने दर्जनों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया और उनसे घिरने के बाद खुद को भी शहीद कर लिया था.

उधमसिंह

भारत के स्वाधीनता संग्राम में उधमसिंह एक ऐसा नाम है, जिसने अपने देश और समाज के लोगों की मौत का बदला लंडन जाकर लिया. उन्होंने जालियांवाला बाग के वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ डायर को गोलियों से भून डाला. लेकिन इस पराक्रमी नायक को भी दलित होने की वजह से इतिहास के पन्नों में जो जगह मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल सकी और महज खानपूर्ति की गई.

रामपति चमार
चौरी-चौरा का इतिहास खंगालने पर यह साफ हो जाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में रामपति चमार और उनके अन्य साथियों का भी उल्लेखनीय योगदान है.

सुभाष चंद्र बोस
जब सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश सरकार को खदेडऩे के लिए 26 जनवरी 1942 को आजाद हिन्द फौज बनाई और “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा” की अपील की तो कैप्टन मोहन लाल कुरील की अगुवाई में हजारों दलित भी फौज में शामिल हो गए. यहां तक की चमार रेजीमेंट पूरी तरह आजाद हिन्द फौज में विलीन हो गई.

इसी तरह के तमाम ऐसे बहुजन नायक हैं जिनका योगदान कहीं दर्ज न हो पाने से वो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए. उन तमाम बहुजन नायकों को दलित दस्तक की श्रद्धांजलि.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

भारत मे पहली बार महिला को होगी फांसी।

भारत मे पहली बार महिला को फाँसी पर लटकाया जाएगा??


  क्या है ये मामला जानते है।
 बात है एप्रैल 2008 कि। यूपी के अमरोहा में एक ही परिवार के 8 सदस्यों की हत्या बड़े ही निर्ममता से के गयी थी। और हत्यारा निकली घर की  अकेली बेटी *शबनम*
 शबनम अपने माँ - बाप की लाडली बेटी थी। पिता प्रोफेसर, शबनम को बड़े लाड प्यार से पाला गया था। और उसने MA तक कि पढ़ाई भी की थी।
 बस शबनम को अपने प्यार में फसाया था एक अनपढ़ पंक्चर छाप लड़के मझहबी सोच वाले लड़के सलीम ने।
शबनम उसके बातो में इतनी आगयी के, जब उसके मा बाप ने इस प्यार का विरोध किया तो ओ पूरे परिवार को नींद की गोलियां खिलाकर अपने आशीष सलीम  के साथ, रंगरेलियां करती थी।
 एक दिन सलीम ने उसे कँहा तेरा परिवार हमारा दुश्मन है, सब को मार डाल, तो शबनम ने अपने घर आकर नींद में बेहोश सोए  अपने परिवार के 7 सदस्य को कुल्हाड़ी से बड़े निर्मार्ता से मार डाला। और शोर मचाया के घर मे किसी ने आकर हमला कर दिया। 
  पुलिस को भी पहले लगा कि इतनी निर्ममता से हत्य्या तो कोई हरामी ही कर सकता है। पर जब जाँच आगे बढ़ी तो, शबनम को गर्भवती पाया गया, जब के न तो उसकी शादी हुयी थी न निकाह। तब पुलिस ने जब डंडा चलाया तो, शबनम ने सब उगल दिया।
 हर कोर्ट ने शबनम की फांसी  को फाँसी की सजा ही सुनाई
 ओर अब राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका भी खारिज कर दी।
 अब एप्रैल 2021 को शबनम को फाँसी पर लटकाया जाएगा।
 ये भारत के स्वतंत्रता के इतिहास में किसी महिला को फाँसी पर लटकाने का पहला केस होगा
 यँहा ये याद रहे, के शबनम ने अपने माँ- बाप, दो सगे भाई, उनकी पत्नियां उनके बेटे, सबको एक मझहबी सलीम के चक्कर मे मौत के घाट उतार दिया था।

 शबनम में जेल के अंदर उसी सलीम का एक बेटा भी जना है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

पृथ्वीराज चौहान और उसका कवि:- इतिहास के पन्नो से

चौहान को याद करो…। 

 आज बसंत पंचमी का प्रेरक अवसर है।  यह मां सरस्वती के ज्ञान के साथ हमारे राष्ट्र की रक्षा   का चमकता प्रमाण है।

 अफगानिस्तान के काबुल में एक अंधेरे सेल में, एक नर शेर गुस्से में घूम रहा था।  जिन तलवारों से दुश्मन के टिड्डों का पीछा किया गया था, वे तलवारें जंजीरों से बंधी हुई थीं।  प्रतिशोध की लपटे अभी भी उसकी छीली हुई आँख के छेद में जल रही थी। ऐसे वीर सपूत का नाम "हिंदु शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान" था!

 अजयमेरु (अजमेर) के राजपूत नायक ने विदेशी इस्लामी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को सोलह बार हराया था और हर बार उदारता दिखाते हुए उसे जिंदा छोड़ दिया, लेकिन जब वह सत्रहवीं बार हार गया, तो मोहम्मद गौरी ने उसे जाने नहीं दिया।  वह उन्हें पकड़कर काबुल-अफगानिस्तान ले गया।  वही गौरी जो सोलह बार पराजित होने के बाद भीख मांगने वाले के रूप में दया की भीख माँगता था, ओ अब उन्हें इस्लाम कबूल करने के लिए लगातार प्रताड़ित कर रहा था।  
पृथ्वीराज ने कहा था, "मर जाना बेहतर है लेकिन इस्लाम कबूल नहीं करना"!

 पृथ्वीराज के वफादार शाही कवि "चाँद बरदाई" अपने राजा पृथ्वीराज से मिलने सीधे काबुल पहुँचे!  चंद बरदाई पृथ्वीराज की दयनीय स्थिति को देखकर हैरान रह गए, जबकि वह वहां एक कैदी थे। उन्होंने गौरी से बदला लेने का फैसला किया, जिन्होंने अपने राजा के साथ ऐसा किया था। उसने अपने राजाओं को अपनी योजना बताई और अनुरोध किया, उस  समय उसे मार दिया जाए।  ”

 चंद बरदाई गौरी के दरबार में आए।  उन्होंने गौरी से कहा, "हमारा राजा एक राजसी सम्राट है ... वह एक महान योद्धा है, लेकिन मेरे राजा की एक विशेषता यह है कि आप इस बात से अवगत नहीं हैं कि हमारे राजा ध्वनि-ध्यान-प्रवेश में पारंगत हैं!"  वे केवल एक ध्वनि अवरोध के साथ तीरों की शूटिंग करके सही निशाना चुनने में अच्छे हैं!  यदि आप चाहें, तो आप अपने लिए उसके भेदी तीरों का अद्भुत प्रदर्शन देख सकते हैं!

 इस पर विश्वास न करते हुए, गौरी ने कहा, "ओह, मैंने आपके राजा की दोनों आँखें तोड़ दी हैं ... तो एक अंधा आदमी धनुष कैसे मार सकता है?"
 
 चंद बरदाई ने विनम्रता से जवाब दिया, "खविंद, अगर आपको सच्चाई पर विश्वास नहीं है, तो आप वास्तव में इस विद्या को देख सकते हैं। ... मेरे राजाओं को यहाँ दरबार में बुलाएँ। यहाँ से कुछ दूरी पर सात लोहे के फ्राइंग पैन रखें ...!"

 गौरी ने धृष्टतापूर्वक मुस्कुराते हुए कहा, "आप अपने राजा के बहुत बड़े प्रशंसक हैं! लेकिन याद रखें ... यदि आपका राजा इस कला को नहीं दिखा सका, तो मैं आपके और आपके राजा के सिर को उसी दरबार में फूँक दूंगा!"

 चंद बरदाई गौरी की शर्त पर सहमत हो गए और जेल में अपने प्यारे राजा से मिलने आए।  वहाँ उन्होंने पृथ्वीराज से गौरी के साथ बातचीत के बारे में बताया, अदालत के विस्तृत लेआउट के बारे में बताया और उन दोनों ने मिलकर अपनी योजना बनाई ...

 जैसा कि योजना बनाई गई थी, गौरी ने अदालत को भर दिया और अपने राज्य के सभी शीर्ष अधिकारियों को इस कार्यक्रम को देखने के लिए आमंत्रित किया।  भल्लर चोपदार ने वर्दी दी कि मोहम्मद गौरी अदालत में आ रहा था।  और गौरी अपनी ऊँची सीट पर बैठ गया!

 चंद बरदाई के निर्देश के अनुसार, सात बड़े लोहे के तवों को एक निश्चित दिशा और दूरी में रखा गया था।  पृथ्वीराज की आंखें निकाली गईं थी और उन्हें अंधा कर दिया गया था, उन्हें चंद बरदाई की मदद से अदालत में लाया गया।  अपने उच्च स्थान के सामने खुले स्थान में, पृथ्वी  राजा को बैठाया गया था ताकि गौरी "भेदी तीर का शब्द" देख सकें।

 चंद बरदाई ने गौरी से कहा, "खविंद, मेरे राजाओं की जंजीरों और हथकड़ी को हटा दिया जाना चाहिए, ताकि वे उनकी इस अद्भुत कला को प्रदर्शित कर सकें।"
 गौरी को इसमें कोई ख़तरा महसूस नहीं हुआ, क्योंकि एक ओर, पृथ्वीराज को  अंधा कर दिया गया था, ओर चाँद बरदाई को छोड़ दिया, तो उसके पास कोई सैनिक नहीं है ... और मेरी सारी सेना मेरे साथ अदालत में मौजूद है  उन्होंने तुरंत पृथ्वीराज को रिहा करने का फरमान जारी किया।

 चंद बरदाई ने अपने प्यारे राजा के पैर छूकर सावधान रहने का अनुरोध किया ... उन्होंने कहा कि उपाधियां उनके राजा की प्रशंसा करती हैं ... और इसी पद के माध्यम से चंद बरदाई ने अपने राजा को संकेत दिया।

 * "चार बाँस, चौबीस गज, सबूत की आठ उंगलियाँ।"
 * ता ऊपर सुल्तान है, याद राखे चौहान। "*

  सुल्तान चार बांस, चौबीस गज और आठ फीट… की ऊंचाई पर बैठा है।  तो राजा चौहान कोई गलती न करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करें!

 इस प्रतीकात्मक डिग्री से, पृथ्वीराज को मोहम्मद गौरी के बैठने की दूरी का सटीक अनुमान लगा।
 
 चंद बरदाई ने फिर से गौरी से निवेदन किया, "सर, मेरे राजा आपके बंदी हैं, इसलिए वे  तब तक  तीर। नहीं चलाएंगे जब तक आप उन्हें आज्ञा नहीं देते, इसलिए आप मेरे राजाओं को इतनी जोर से तीर चलाने की आज्ञा दें कि ओ उन्हें स्वयं सुन सकें।"

 गौरी प्रशंसा से अभिभूत था और वह जोर से चिल्लाया, * "चौहान चललो तीर ... चौहान चालो तीर!!"

 जैसे ही पृथ्वीराज चौहान ने गौरी की आवाज़ सुनी, उन्होंने अपने धनुष पर तीर चढ़ाया और गौरी की आवाज़ की दिशा में तीर चलाया और तीर ने गौरी की छाती में छेद कर दिया!

 मोहम्मद गौरी का शरीर सिंहासन से नीचे गिर गया, और चिल्लाया "या अल्लाह! दाग हो गया"!

 कोर्ट में एक ही हंगामा शुरू हो गया।  सभी प्रमुख कांप उठे, उसी अवसर को लेते हुए, चंद बरदाई अपने प्यारे राजा के पास भागे ... उन्होंने अपने राजा को बताया कि गौरी की मृत्यु हो गई और उनका पतन हो गया ... उनके बहादुर राजा को प्रणाम किया ... वे दोनों एक दूसरे से गले मिले .उन्हें ये मालूम था के गौरी की सेना  अब अत्याचार करेगी और हमे मार डालेगी... इसलिए, जैसा कि योजना बनाई गई थी, दोनों ने एक-दूसरे पर हमला किया और वसंत पंचमी के शुभ दिन पर, उन्होंने मां सरस्वती के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया!

 पृथ्वीराज चौहान और कवि चंद बरदाई के आत्म-बलिदान की यह वीर गाथा हमारे भारतीय बच्चों को गर्व के साथ सुनाई जानी चाहिए, और उन तक पहुँचना आवश्यक है, इसलिए हम आज आपके सामने इसे लेकर आए हैं।

क्या मुस्लिम देशभक्त होते है?*

 *क्या मुस्लिम देशभक्त होते है?* *9 मई काला दिवस जाहिर पाकिस्तान में*  अब हम ऊपर के दोनो मुद्दे को एक दूसरे से जोड़कर निर्णय ले सकते है  194...